"न्याय के रक्षक ने तोड़ा कानून: एससी/एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर वकील को 12 साल की सजा"

Published: 06 Nov 2025, 07:24 AM   |   Updated: 06 Nov 2025, 07:23 AM
Category: उत्तर प्रदेश   |   By: Admin

लखनऊ (महानाद): महिला का इस्तेमाल कर एससी/एसटी एक्ट का दुरुपयोग करने वाले वकील को विशेष न्यायाधीश (एससी/एसटी एक्ट) विवेकानंद शरण त्रिपाठी की अदालत ने 12 साल की सजा सुनाई है। साथ ही, अदालत ने उस पर 45 हजार रुपये का जुर्माना भी लगाया है। वकील पर एससी/एसटी एक्ट में पीड़ित को मिलने वाले मुआवजे को हड़पने का दोष भी साबित हुआ है।

कोर्ट ने फैसले में कहा कि “यह मुकदमा सत्य की खोज की एक यात्रा थी, जिसमें यह स्पष्ट हुआ कि पूरी कहानी काल्पनिक थी और अभियुक्तों व कथित पीड़िता को एक शातिर वकील ने कठपुतली की तरह इस्तेमाल किया।”

मामला वर्ष 2023 का है, जब पूजा रावत नाम की महिला ने चिनहट थाने में मुकदमा दर्ज कराते हुए आरोप लगाया था कि विपिन यादव, रामगोपाल यादव, मोहम्मद तासुक और भागीरथ पंडित ने उसके साथ मारपीट, छेड़छाड़ की और जातिसूचक शब्दों का प्रयोग किया। महिला की शिकायत पर पुलिस ने विभिन्न धाराओं में मुकदमा दर्ज किया था।

सुनवाई के दौरान जब पीड़िता अदालत में पेश हुई, तो उसने चौंकाने वाला खुलासा किया कि उसके साथ ऐसी कोई घटना नहीं हुई थी। उसने बताया कि वकील परमानंद गुप्ता ने उसके दस्तावेजों का दुरुपयोग करते हुए निर्दोष लोगों के खिलाफ फर्जी मुकदमा दर्ज कराया था।

अदालत ने कहा कि वकील ने न केवल निर्दोष लोगों को फंसाने की साजिश रची, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता को भी कलंकित किया। कोर्ट ने टिप्पणी की कि “वादिनी और अभियुक्त दोनों ही कठपुतलियां थे, असली सूत्रधार वकील था, जिसने एससी/एसटी एक्ट की भावना को तोड़-मरोड़ कर झूठा मुकदमा गढ़ा।”

कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिए कि फर्जी मुकदमे दर्ज कराने वालों पर सख्त कार्रवाई की जाए और ऐसे मामलों में राहत राशि केवल आरोप पत्र दाखिल होने के बाद ही दी जाए, ताकि कानून का दुरुपयोग रोका जा सके।

इसके साथ ही डीएम लखनऊ को आदेश दिया गया है कि पूजा रावत को दी गई ₹75 हजार की राहत राशि वकील परमानंद गुप्ता से वसूल की जाए, और यह जांच की जाए कि उसने पहले भी इस तरह के कितने मामले दर्ज कराए हैं।

गौरतलब है कि इससे पहले 19 अगस्त को एससी/एसटी कोर्ट ने वकील परमानंद गुप्ता को एक अन्य मामले में आजीवन कारावास की सजा भी सुनाई थी। अदालत ने अपने आदेश की प्रति उत्तर प्रदेश बार काउंसिल, इलाहाबाद को भेजी है ताकि उसकी वकालत पर प्रतिबंध लगाया जा सके।

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