Published:
20 Feb 2026, 06:21 AM
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Updated:
20 Feb 2026, 06:24 AM
Category:
उत्तराखंड
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By: Admin
देहरादून/गैरसैंण। उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों पारा गिरा हुआ है, लेकिन सियासी गलियारों में तपिश चरम पर है। वजह है—आगामी बजट सत्र। 9 मार्च से 13 मार्च तक भराड़ीसैंण (गैरसैंण) में सत्र आहूत है, लेकिन विडंबना देखिए कि चर्चा इस बात पर नहीं है कि पहाड़ के विकास के लिए बजट के पिटारे में क्या होगा, बल्कि चर्चा इस पर है कि वहां सांस लेने के लिए ऑक्सीजन कितनी होगी।
बीजेपी विधायक महंत दिलीप रावत के ताजा बयान ने इस बहस को नई हवा दे दी है। उन्होंने सीधे तौर पर विधानसभा भवन के चयन पर ही सवाल उठा दिए। तर्क दिया गया कि भवन इतनी ऊंचाई पर है कि वहां ऑक्सीजन की कमी खलती है और बर्फबारी के बीच विधायकों-कर्मचारियों का टिकना दूभर है। लेकिन सवाल यह उठता है कि जिस पहाड़ के बूते राज्य बना, क्या अब उसी पहाड़ की ऊंचाई नेताओं को डराने लगी है? क्या यह सिर्फ भौगोलिक समस्या है या देहरादून के ऐशो-आराम को छोड़ने की बेबसी?
सियासतदानों के सुर में सुर मिलाते हुए सचिवालय संघ ने भी मोर्चा खोल दिया है। महासचिव राकेश जोशी ने स्पष्ट कहा है कि वहां रहने-खाने की बुनियादी दिक्कतें हैं। नोडल अधिकारियों की संख्या कम करने की मांग उठ रही है। यह मांग जायज हो सकती है, लेकिन यह उस सिस्टम पर तमाचा भी है जिसने सालों बीतने के बाद भी वहां एक मुकम्मल व्यवस्था खड़ी नहीं की। क्या करोड़ों रुपये सिर्फ एक भव्य इमारत खड़ी करने के लिए फूंके गए थे?
कांग्रेस अध्यक्ष गणेश गोदियाल ने सरकार को आड़े हाथों लेते हुए इसे 'मानसिक हार' करार दिया है। विपक्ष का तर्क सीधा है—अगर ठंड है तो इंतजाम कीजिए, अगर बर्फ है तो रास्ते खोलिए, लेकिन पहाड़ को दोष देकर भागिए मत। याद रहे, 2024 और 2025 में भी बजट सत्र देहरादून शिफ्ट कर दिया गया था। क्या 2026 में भी इतिहास खुद को दोहराएगा?
गैरसैंण सिर्फ एक नाम नहीं, राज्य आंदोलनकारियों की भावनाओं का केंद्र है। यदि लोकतंत्र के मंदिर में ही बैठने से 'सांसें' फूलने लगें, तो उन ग्रामीणों का क्या होगा जो ताउम्र इन्हीं दुर्गम पहाड़ियों पर अपना जीवन काट देते हैं? यह ऑक्सीजन की कमी नहीं, बल्कि उस राजनीतिक संकल्प की कमी है जो देहरादून की चकाचौंध से बाहर नहीं निकल पा रही।
