Published:
28 Feb 2026, 08:52 AM
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Updated:
28 Feb 2026, 08:56 AM
Category:
उत्तराखंड
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By: Admin
गंगोलीहाट (पिथौरागढ़): उत्तराखंड के प्रसिद्ध शक्तिपीठ ऐतिहासिक हाट कालिका मंदिर में अष्टमी के पवित्र अवसर पर लोकसंस्कृति का अद्भुत नजारा देखने को मिला। मंदिर परिसर भक्तिमय वातावरण, ढोल-दमाऊं की थाप और पारंपरिक होली गीतों की स्वर लहरियों से गुंजायमान हो उठा, जब परंपरा के अनुरूप 'होली चीर' विधिवत रूप से बांधी गई।
जैसे ही दरबार में चीर बंधी, वैसे ही समूचे क्षेत्र में होली उत्सव के शुभारंभ का संदेश फैल गया। यह केवल एक रस्म नहीं, बल्कि आस्था, लोकसंस्कृति और सामूहिक उत्साह का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि ब्रज के बाद अगर होली का असली रंग कहीं दिखता है, तो वह कुमाऊं अंचल है, और गंगोलीहाट की होली इसका जीवंत उदाहरण है।
होली चीर उत्तराखंड, विशेषकर कुमाऊं अंचल की प्राचीन परंपरा है, जो वसंत ऋतु के आगमन और नई फसल की खुशियों से जुड़ी है। यह उत्सव प्रकृति के नवोन्मेष, खेतों की हरियाली और जीवन में रंगों के संचार का संदेश देता है।
"माता महाकाली के आंगन में गाई जाने वाली होली का रंग भक्ति के उत्साह से परिपूर्ण रहता है। पलायन के चलते पुरानी रंगत भले ही कुछ फीकी पड़ी हो, लेकिन गंगोली के लोगों की उमंग में आज भी कोई कमी नहीं है।" — स्थानीय श्रद्धालु
धार्मिक मान्यता के अनुसार, होली चीर बांधना होलिका दहन और फाल्गुनी उत्सवों की औपचारिक शुरुआत है। महाकाली की वंदना के बाद पूरे क्षेत्र में बैठकी होली और खड़ी होली के स्वर गूंजने लगे हैं, जो आने वाले दिनों में समूची गंगोली को रंगों के उत्सव में डुबो देंगे।
