Published:
17 Feb 2026, 10:31 AM
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Updated:
17 Feb 2026, 10:35 AM
Category:
उत्तराखंड
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By: Admin
देहरादून। रंगों का त्योहार होली इस बार अपने साथ कई खगोलीय और ज्योतिषीय संयोग लेकर आ रहा है। वर्ष 2026 में श्रद्धालुओं के बीच तारीखों को लेकर ऊहापोह की स्थिति बनी हुई है, क्योंकि लंबे समय बाद ऐसा संयोग बना है जब होलिका दहन और धुलेंडी (रंग) के बीच एक दिन का अंतराल रहेगा। इसका मुख्य कारण भद्रा, पूर्णिमा तिथि का समय और चंद्रग्रहण की उपस्थिति है
ज्योतिषाचार्यों के अनुसार, फाल्गुन पूर्णिमा तिथि 2 मार्च की शाम 5:56 बजे से शुरू होकर 3 मार्च की शाम 5:08 बजे तक रहेगी।
प्रदोष काल का महत्व: शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन उसी दिन श्रेष्ठ है, जब प्रदोष काल (शाम का समय) में पूर्णिमा तिथि हो।
भद्रा का पेंच: 2 मार्च को शाम 6:22 से रात 8:53 तक प्रदोष काल रहेगा। हालांकि इस दौरान भद्रा रहेगी, लेकिन भद्रा मुख नहीं होने के कारण यह समय दोषमुक्त है।
आचार्य डॉ. सुशांत राज के अनुसार, भद्रा मुख को त्यागकर प्रदोष बेला में होलिका दहन करना ही शास्त्रसम्मत और शुभ फलदायी है।
आचार्य पवन पाठक के अनुसार, 3 मार्च को प्रदोष काल में चंद्रग्रहण का प्रभाव रहेगा।
ग्रहण का सूतक: शास्त्रों में ग्रहण काल के दौरान किसी भी प्रकार के शुभ कार्य या उत्सव वर्जित माने गए हैं।
तिथि का टकराव: 3 मार्च को शाम तक पूर्णिमा तिथि विद्यमान रहेगी, जबकि रंगोत्सव हमेशा चैत्र कृष्ण प्रतिपदा में मनाया जाता है। ग्रहण और तिथि के इस तालमेल के कारण इस दिन उत्सव नहीं मनेगा।
राजधानी देहरादून के बाजारों और मोहल्लों में होली की रौनक अभी से दिखने लगी है। शहर के सहारनपुर रोड, निरंजनपुर, माजरा, परम विहार और प्रिंस चौक जैसे प्रमुख स्थानों पर लकड़ी और गोबर के कंडों से विशाल होलिकाएं सजाई जा रही हैं। स्थानीय समितियों ने दो दिन के इस अंतराल को देखते हुए विशेष इंतजाम किए हैं ताकि उत्सव की गरिमा बनी रहे।
"2 मार्च को भद्रा के पुच्छ काल और प्रदोष काल के संयोग में दहन करना कल्याणकारी है। 3 मार्च को ग्रहण के सूतक के कारण संयम बरतें और 4 मार्च को पूरे हर्षोल्लास के साथ होली खेलें।" — आचार्य डॉ. सुशांत राज
