उत्तराखंड में 'सस्ते घरों' के सपने पर ग्रहण: 5 महीने बाद भी PMAY 2.0 को नहीं मिले 'बिल्डर', सरकार का पेमेंट मॉडल बना रुकावट

Published: 17 Feb 2026, 09:43 AM   |   Updated: 17 Feb 2026, 09:46 AM
Category: उत्तराखंड   |   By: Admin

देहरादून। उत्तराखंड में बेघर परिवारों को सस्ता आशियाना देने की सरकार की मुहिम को बड़ा झटका लगा है। प्रधानमंत्री आवास योजना (शहरी) 2.0 के अंतर्गत पीपीपी (PPP) मोड पर प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए राज्य सरकार को पिछले पांच महीनों से निजी डेवलपर्स की तलाश है, लेकिन विज्ञापन और टेंडर के बावजूद कोई भी कंपनी आगे नहीं आ रही है। स्थिति यह है कि फरवरी में दोबारा जारी किए गए टेंडर की मियाद 31 मार्च को खत्म होने वाली है, लेकिन सरकार की झोली अब भी खाली है।

क्यों कतरा रहे हैं बिल्डर्स? (Key Reasons)

  • भुगतान का पेंच: विशेषज्ञों के अनुसार, सरकार का मौजूदा पेमेंट मॉडल डेवलपर्स को रास नहीं आ रहा है। प्रोजेक्ट के लिए पैसा लाभार्थियों की किश्तों और सरकारी सब्सिडी पर निर्भर है, जिसमें अक्सर देरी होती है।

  • वित्तीय जोखिम: रियल एस्टेट क्षेत्र का मानना है कि कैश फ्लो (पैसे का प्रवाह) सुनिश्चित न होने से ऐसी परियोजनाएं आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन जाती हैं।

  • कठिन नियम: निजी कंपनियां निर्माण की लागत और सरकारी नियंत्रण के बीच तालमेल नहीं बिठा पा रही हैं।

देशभर में 'ठंडा' पड़ा मॉडल: अन्य राज्यों का भी यही हाल

अफोर्डेबल हाउसिंग के प्रति निजी क्षेत्र की बेरुखी केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक:

  1. महाराष्ट्र और राजस्थान: यहां भी पीपीपी प्रोजेक्ट्स को गति देने के लिए सरकारों को संघर्ष करना पड़ रहा है।

  2. समाधान की कोशिश: मध्य प्रदेश जैसे राज्यों ने डेवलपर्स को लुभाने के लिए अतिरिक्त एफएआर (FAR), विकास शुल्क में भारी छूट और सिंगल विंडो क्लीयरेंस जैसे प्रलोभन दिए हैं।

CM धामी ने केंद्र से मांगी 'संजीवनी'

राज्य में आवास योजना की सुस्त रफ्तार को देखते हुए मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने केंद्र सरकार से दखल की अपील की है। मुख्यमंत्री ने केंद्र से विशेष प्रोत्साहन पैकेज और नियमों में लचीलापन देने का अनुरोध किया है ताकि निजी क्षेत्र को इस ओर आकर्षित किया जा सके। सरकार को डर है कि यदि जल्द ही डेवलपर्स नहीं मिले, तो योजना की समयसीमा काफी आगे बढ़ जाएगी।

"हम चाहते हैं कि निजी डेवलपर्स इसमें सहभागी बनें, लेकिन वित्तीय व्यवहार्यता (Financial Viability) एक बड़ा मुद्दा है। हम नियमों में सुधार और अतिरिक्त रियायतें देने पर विचार कर रहे हैं।"सूत्र, शहरी विकास विभाग

निष्कर्ष: घर की राह और हुई लंबी

अगर 31 मार्च तक टेंडर प्रक्रिया में कोई बड़ा मोड़ नहीं आता है, तो प्रदेश के शहरी क्षेत्रों में हजारों गरीब परिवारों को अपने घर की चाबी मिलने का इंतजार साल-दर-साल लंबा हो सकता है। अब सबकी नजरें इस पर हैं कि सरकार बिल्डरों को लुभाने के लिए अपने 'पॉकेट' से क्या नया ऑफर निकालती है।

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