मान्यता कार्ड पर मचा घमासान: छोटे अखबारों के पत्रकारों में रोष, महानिदेशक से उठे तीखे सवाल

Published: 21 Feb 2026, 12:19 PM   |   Updated: 21 Feb 2026, 12:20 PM
Category: उत्तराखंड   |   By: Admin

देहरादून। कभी सहज, मिलनसार और पत्रकारों के बीच लोकप्रिय छवि के लिए पहचाने जाने वाले सूचना विभाग के महानिदेशक बंशीधर तिवारी इन दिनों विवादों के घेरे में हैं। जिला स्तरीय मान्यता कार्डों के नवीनीकरण में हो रही देरी और कथित दोहरे व्यवहार ने लघु समाचारपत्रों से जुड़े पत्रकारों में असंतोष की लहर पैदा कर दी है।

“बड़ों को पुचकार, छोटों को दुत्कार” का आरोप

लघु समाचारपत्र एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेन्द्र अग्रवाल ने आरोप लगाया है कि जहां राज्य स्तरीय पत्रकारों को एक सप्ताह पहले ही नए कार्ड जारी कर दिए गए, वहीं जिला स्तरीय मान्यता प्राप्त पत्रकारों को अपमानजनक टिप्पणियों और लंबी प्रक्रियाओं का सामना करना पड़ रहा है।

उन्होंने दावा किया कि जब मान्यता अवधि 31 जनवरी को समाप्त हो चुकी है, तब भी तीन सप्ताह बाद तक सैकड़ों पत्रकार अपने कार्ड के इंतजार में भटक रहे हैं। देहरादून जनपद में ही पांच सौ से अधिक जिला स्तरीय पत्रकार प्रभावित बताए जा रहे हैं।

“पंचर वाले तक हैं मान्यता प्राप्त” टिप्पणी पर बवाल

आरोप है कि मान्यता प्रक्रिया पर चर्चा के दौरान महानिदेशक की ओर से यह टिप्पणी की गई कि “यहां आकर लोग बता जा रहे हैं कि पंचर वाले तक मान्यता प्राप्त हैं।” इस कथन को पत्रकार समुदाय ने अपनी गरिमा पर आघात बताया है।

प्रश्न उठाए जा रहे हैं कि यदि मान्यता देने में अनियमितता हुई है, तो जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं की गई।

एलआईयू जांच से बढ़ी तल्खी

इस बार नवीनीकरण प्रक्रिया में एलआईयू जांच को भी शामिल किए जाने से विवाद और गहरा गया है। पत्रकारों का आरोप है कि एलआईयू द्वारा पूछताछ का तरीका आपराधिक जांच जैसा है, जिससे स्वाभिमानी पत्रकार खुद को अपमानित महसूस कर रहे हैं।

“मान्यताएं घटेंगी तो बोझ कम होगा”

महानिदेशक की एक अन्य टिप्पणी—“मान्यताएं घटेंगी तो हमारा बोझ कम होगा”—को भी लेकर सवाल उठ रहे हैं। पत्रकारों का कहना है कि मान्यता से विभाग पर कौन-सा असहनीय वित्तीय भार पड़ता है, यह स्पष्ट किया जाना चाहिए।

दोष सिद्धि से पहले कार्रवाई क्यों?

सूचना विभाग की ओर से यह तर्क भी दिया जा रहा है कि जिन पर मुकदमे दर्ज हैं, उनकी मान्यता समाप्त हो सकती है। इस पर पत्रकारों ने सवाल उठाया है कि क्या केवल मुकदमा दर्ज होने से ही व्यक्ति दोषी माना जा सकता है?

समाधान की उम्मीद

साढ़े तीन वर्षों में लोकप्रिय रहे महानिदेशक से अब भी संवाद और समाधान की उम्मीद जताई जा रही है। पत्रकारों का कहना है कि स्पष्ट और पारदर्शी नियम बनाकर मान्यता प्रक्रिया को विवादों से दूर रखा जा सकता है, ताकि वास्तविक पत्रकारों की गरिमा बनी रहे और अनियमितताओं पर भी अंकुश लगे।

फिलहाल, मान्यता कार्ड का यह मुद्दा केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि पत्रकार समुदाय के आत्मसम्मान से जुड़ा सवाल बन चुका है।

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