पहाड़ में 'पेंशन' की डगर हुई पथरीली: सत्यापन के नाम पर बुजुर्गों की अग्निपरीक्षा, केदारघाटी के गांवों में फूटा आक्रोश

Published: 24 Feb 2026, 10:11 AM   |   Updated: 24 Feb 2026, 10:11 AM
Category: उत्तराखंड   |   By: Admin

पहाड़ की कठिन भौगोलिक परिस्थितियां और उस पर सिस्टम का अव्यवहारिक रवैया... इन दिनों उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के बुजुर्ग किसान इसी दोहरी मार को झेलने को मजबूर हैं। किसान पेंशन निधि के नाम पर लागू किए गए नए अपडेट और किसान आईडी बनाने की प्रक्रिया ने बुजुर्गों के लिए राहत से ज्यादा आफत पैदा कर दी है।

सत्यापन के 'चक्रव्यूह' में फंसे बुजुर्ग

सरकार ने पारदर्शिता लाने और फर्जीवाड़ा रोकने के लिए सत्यापन और किसान आईडी बनाना अनिवार्य किया है। इसके लिए राजस्व क्षेत्रों में शिविर लगाए जा रहे हैं, लेकिन पहाड़ की खड़ी चढ़ाई और गांवों से इन शिविरों की दूरी बुजुर्गों की हिम्मत तोड़ रही है। सीमित परिवहन सुविधाओं के बीच लाठी टेकते हुए बुजुर्ग कई किलोमीटर का सफर तय कर रहे हैं।

ग्रामीणों का दर्द: "राहत कम, आफत ज्यादा"

केदारघाटी के ग्रामीण और बुजुर्ग किसानों ने इस प्रक्रिया पर कड़ा ऐतराज जताया है। शिव शंकर नेगी, महेंद्र सिंह रावत और अनसूया प्रसाद सहित कई ग्रामीणों का कहना है कि:

"सरकार को हमारी उम्र और पहाड़ के रास्तों का ख्याल रखना चाहिए था। पेंशन का हक पाने के लिए इस उम्र में इतनी भागदौड़ करना हमारे साथ अन्याय है।"

वयोवृद्ध दिलदेई देवी और मवेशी देवी ने बताया कि खराब रास्तों के कारण शिविरों तक पहुंचना उनके लिए किसी चुनौती से कम नहीं है।

गांव-गांव शिविर या डिजिटल समाधान की मांग

किसानों ने सरकार को सुझाव देते हुए इस नीति में बदलाव की मांग की है। ग्रामीणों का कहना है कि:

  1. ग्राम स्तर पर शिविर: एक या दो बड़े शिविरों के बजाय हर गांव या पंचायत स्तर पर छोटे शिविर लगाए जाएं।

  2. CSC का विकल्प: यह कार्य स्थानीय कॉमन सर्विस सेंटर (CSC) के माध्यम से कराया जाए ताकि घर के पास सुविधा मिले।

  3. ऑनलाइन ऐप: सरकार को एक सरल ऑनलाइन एप्लिकेशन लॉन्च करनी चाहिए थी ताकि युवा पीढ़ी अपने घर के बुजुर्गों का सत्यापन मोबाइल से ही कर सके।

अव्यावहारिक साबित हो रही नीति

देशभर में किसान सम्मान निधि और पेंशन योजनाओं का लाभ करोड़ों किसानों को मिल रहा है, लेकिन उत्तराखंड के परिप्रेक्ष्य में यह नया अपडेट फिलहाल अव्यावहारिक नजर आ रहा है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि फर्जीवाड़ा रोकने की आड़ में उन ईमानदार बुजुर्गों को प्रताड़ित किया जा रहा है, जिन्होंने अपना पूरा जीवन इन खेतों को सींचने में लगा दिया।

प्रशासनिक रुख: स्थानीय ग्रामीणों ने अब सरकार और जिला प्रशासन से गुहार लगाई है कि पर्वतीय परिस्थितियों को देखते हुए नियमों में ढील दी जाए और गांव स्तर पर ही सत्यापन की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

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